कलेक्टर के आदेश का उल्लंघन, संभागायुक्त के आदेश पर भी अमल नहीं
अवैध कालोनी घोषित करने के बाद भी चल रहा है काम
इंदौर ( जनहित मीडिया )। रंगवासा की सर्वे क्रमांक 1 और 4 की वेशकीमती जमीन पर भूमाफियाओं द्वारा कॉलोनी काटने की शिकायत और समाचार पत्रों में खबरों के बाद अपर कलेक्टर ने कॉलोनी को अवैध घोषित कर दिया और तात्कालिक कलेक्टर आशीष सिंह ने जमीन का बटांकन निरस्त करने का आदेश दिया था, लेकिन 1 साल बीत जाने के बाद भी कलेक्टर के आदेश का पालन नहीं हुआ।


इंदौर की रौ8 तहसील के रंगवासा की सर्वे क्रमांक 1 और 4 की वेशकीमती शासकीय पट्टे की जमीन को लेकर एक वर्ष पूर्व तात्कालिक अपर कलेक्टर, तात्कालिक कलेक्टर और संभागायुक्त के आदेश का पालन नहीं कर कुछ अफसरों द्वारा भूमाफिया का सहयोग करने का काम किया जा रहा है। जिस जमीन पर राहुल तंवर द्वारा कालोनी काटी जा रही है वह शासकीय पट्टे की जमीन है जिसे किसानों को बेचने का अधिकार नहीं है बावजूद इसके खेती करने के लिए दी गई सरकारी जमीन को कॉलोनाइजर के हवाले कर दिया और कुछ अधिकारियों ने उसमें इस तरह ये योजनाबद्ध तरीके से सहयोग किया कि शासकीय जमीन फिसलकर भूमाफिया के कब्जे में जा चुकी है।
सरकार के हाथ से ऐसे फिसली बेशकीमती जमीन
1968 में सरकारी जमीन सर्वे क्रमांक 1 और 4 पर संस्था का नाम चढ़ा, बाद में फिर शासन का नाम आया लेकिन 1978 में फिर संस्था का नाम दर्ज किया गया, लेकिन किस आदेश के आधार पर नाम दर्ज हुआ उसका रिकॉर्ड नहीं है। उसके बाद संस्था परिसीमापन में चली गई और सहकारिता अधिकारियों ने संस्था की तरफ से जमीन को वापस राजस्व को लौटा दिया और संस्था का पंजीयन रद्द कर दिया संस्था समाप्त होने के बाद संस्था के 18 सदस्यों का बटवारा कर 2003 में किसानों के नाम चढ़ा दिया। बाद में इन्हीं किसानों ने जमीन बेच दी जबकि किसान जमीन मालिक कैसे बने यह आज भी जांच का विषय है। किसानों का मालिकाना हक अवैधानिक है ।जमीन की हिस्ट्री समझे शासन- प्रशासन
कोई भी व्यक्ति रजिस्ट्री रखकर या नामांतरण करवा लेने से जमीन का मालिक नहीं होता। विवाद की स्थिति में जमीन की मिसल से लेकर वर्तमान तक स्थिति का अध्ययन करने के बाद ही जमीन मालिक तय किया जा सकता है। ऐसे में मिसल रिकॉर्ड से 2003 में किसानों के नाम बंटवारा होने तक इस सरकारी जमीन का इतिहास एक बार फिर से समझने की आवश्यकता है। अन्यथा शासन की बेशकीमती जमीन तंत्र में शामिल कुछ भ्रष्टो के कारण माफिया के हाथ में आसानी से जा रही है।
डीम्ड अनुमति की आड़ में सहयोग
बेस्ट कीमती सरकारी जमीन ठिकाने लगाने में कलेक्ट्रेट स्थित कॉलोनी सेल कार्यालय के अधिकारियों की बड़ी भूमिका रही है। राहुल तंवर द्वारा पट्टे की जमीन पर विकास अनुमति के लिए आवेदन लगाने के बाद कॉलोनी सेल द्वारा लंबे समय तक किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई, जिसे डीम्ड अनुमति मानकर तंवर ने काम शुरू कर दिया। जबकि कालोनी सेल विभाग को विकास अनुमति आवेदन पर आपत्ति लेते हुए आवेदन निरस्त करना चाहिए या, जो प्रकरण कोर्ट जाने के बाद किया।


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