मध्य प्रदेश का वर्तमान स्वरूप राज्य पुनर्गठन आयोग (States Reorganisation Commission) की सिफारिशों और तत्कालीन राजनीतिक दिग्गजों की दूरदर्शिता का परिणाम है।
भोपाल को राजधानी बनाने की कहानी

मध्य प्रदेश की राजधानी कहाँ होगी, यह एक बड़ा विवाद था, जिस पर पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र के पत्र और पंडित जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप से मुहर लगी।
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विशाल हिंदी प्रदेश का संकल्प:
- नागपुर में प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल और महाकौशल के नेताओं ने महाकौशल, मध्य भारत, भोपाल एवं विंध्य प्रदेश का एकीकरण करके एक विशाल हिंदी भाषी प्रदेश बनाने का निर्णय लिया।
- उनका उद्देश्य उत्तर प्रदेश, बिहार एवं राजस्थान के बराबर एक बड़ा और संपदा से परिपूर्ण राज्य बनाना था।
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पं. द्वारका प्रसाद मिश्र का हस्तक्षेप:
- पं. मिश्र को लगा कि अलग-अलग राज्य बनने पर महाकौशल और मध्य भारत दोनों ही आर्थिक दृष्टि से घाटे वाले राज्य होंगे।
- उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर तर्क दिया कि एक साथ आने पर नया मध्य प्रदेश सभी प्रकार की संपदा से युक्त होगा और अन्य राज्यों के लिए आधार स्तंभ बनेगा।
- नेहरू जी ने तुरंत इस सिफारिश को स्वीकार किया और भोपाल को राजधानी बनाने का निर्णय लिया।
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नेहरू जी की शुरुआती आपत्ति:

मध्य प्रदेश की पहली मंत्रिपरिषद लाल परेड मैदान पर कार्यक्रम में. चित्र में प्रथम पंक्ति में दायें से बायें रानी पदमावती देवी और मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल। - मध्य भारत के प्रथम मुख्यमंत्री लीलाधर जोशी के अनुसार, प्रशासनिक दृष्टि से राजधानी भोपाल में होनी चाहिए थी।
- हालांकि, जब प्रस्तावित राज्य का नक्शा नेहरू जी के सामने रखा गया, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि “इतना लंबा चौड़ा और बेढंगा प्रदेश कैसे बन सकता है?” लेकिन अंततः उन्होंने इस विचार को स्वीकार कर लिया।
जबलपुर को हाईकोर्ट मिलने की वजह
भोपाल को राजधानी बनाए जाने से जबलपुर (महाकौशल क्षेत्र) के निवासियों और नेताओं में निराशा थी, क्योंकि यह क्षेत्र लंबे समय से न्यायिक और राजनीतिक केंद्र रहा था।
- पं. मिश्र का आग्रह: राजधानी के संबंध में जबलपुर के निवासियों की निराशा को देखते हुए, पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र ने पंडित रविशंकर शुक्ल से मुलाकात की और आग्रह किया कि कम से कम हाईकोर्ट की स्थापना जबलपुर में होनी चाहिए।
- समझौते के रूप में स्थापना: इस आग्रह को स्वीकार किया गया, और एक तरह के राजनीतिक और क्षेत्रीय संतुलन के रूप में, राज्य का प्रशासनिक केंद्र भोपाल में रहा, जबकि उच्च न्यायालय (High Court) जबलपुर में स्थापित किया गया।
पुनर्गठन आयोग से जुड़े अन्य किस्से

- पणिक्कर की नाराजगी: राज्य पुनर्गठन आयोग के सदस्य के. एम. पणिक्कर कुछ जिलों को नए मध्य प्रदेश में शामिल करने की नेताओं की मांगों से नाराज हो गए थे। उन्होंने कहा था कि जिलों के बंटवारे का अधिकार आयोग के सदस्यों का है।
- ललितपुर का विवाद: पं. द्वारका प्रसाद मिश्र ने आयोग के सदस्य पणिक्कर को बताया था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के कुछ जिलों (झाँसी, बांदा, हमीरपुर, जालौन) को नए मध्य प्रदेश में इसलिए नहीं माँगा, क्योंकि गोविंद वल्लभ पंत (तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री) ललितपुर तहसील जैसे छोटे क्षेत्र को भी देने के लिए तैयार नहीं थे। ललितपुर उत्तर प्रदेश में होने के कारण मध्य प्रदेश के डाकुओं का शरण स्थल बन गया था।
ये घटनाक्रम दर्शाते हैं कि मध्य प्रदेश का गठन केवल नक्शे पर लकीरें खींचना नहीं था, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों की आकांक्षाओं, नेताओं की राजनीतिक सूझबूझ और देश के संघीय ढांचे में संतुलन स्थापित करने का एक जटिल प्रयास था।

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