उज्जैन में पदस्थ रहते एक ठेकेदार से रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ने वाली सहायक यंत्री को कार्यपालन यंत्री बना दिया
ऐसी भी क्या जल्दी थी : जुलाई 2024 में ठेकदारों से रिश्वत लेते बेशर्म रंग हाथो में लगा था, 2026 में उपकृत कर दिया सरकार ने विभागीय जांच में फंसे कई अफसर सूची से बाहर
इंदौर/भोपाल ( जनहित मीडिया)। उज्जैन में पदस्थ रहते हुए लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ( पीएचई ) की एक महिला अधिकारी ने ठेकेदार का बिल रोककर उससे रिश्वत मांगी। ठेकेदार की शिकायत पर 60 हज़ार की रिश्वत लेते हुए लोकायुक्त पुलिस द्वारा रंगेहाथ पकड़ी गई। अभी इस प्रकरण को 2 वर्ष भी नहीं हुए थे कि विभाग की डीपीसी में महिला को पदोन्नति मिल गई। वे

अधिकारियों के तबादला सूची में ऐसे नाम भी है जिन्हें लोकायुक्त में रंगे हाथ पकड़ रिश्वत लेते हुए उनके हाथ बदरंग हुए। लोकायुक्त ने चालान भी पेश नहीं किया, प्रकरण में अभी कोई फैसला नहीं आया परंतु सरकार ने जल्दबाजी दिखाई और प्रमोशन कर डाला। जबकि दूसरी तरफ विभाग की छोटी-मोटी जांचों में फंसे अधिकारी मुंह ताकते रह गए। कुल मिलाकर मसला सेटिंग और पहुंच का मालूम पड़ता है। मामला वर्तमान में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के चीफ इंजीनियर कार्यालय रेस कोर्स रोड इंदौर कार्यालय में पदस्थ निधि मिश्रा का है। निधि मिश्रा 2 वर्ष पहले जुलाई 2024 में जल जीवन मिशन योजना में काम करने वाले एक ठेकेदार के 80 लाख रुपए के काम के बदले में 10 लाख रुपए रोक लिए और रकम रिलीज करने के लिए ठेकेदार से रिश्वत की मांग की। ठेकेदार ने लोकायुक्त एसपी को इसकी शिकायत की जिसके बाद लोकायुक्त पुलिस ने निधि मिश्रा को 60 हज़ार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथों पकड़ा था। जुलाई में इस प्रकरण को 2 वर्ष हो रहे हैं, जानकारी के अनुसार प्रकरण में लोकायुक्त द्वारा अभी चालान पेश नहीं किया गया है मामला जांच पड़ताल में है अभी किसी तरह का निर्णय नहीं हुआ है। लेकिन अफसर को पदोन्नति मिल गई और उन्हें सहायक के यंत्री से कार्यपालन यंत्री बना दिया गया है।
भ्रष्टाचार को मिली प्रोत्साहन है ये पदोन्नति
ऐसे में सवाल तो उठता है कि सरकार को इतनी भी क्या जल्दी थी कि जिस अफसर को लोकायुक्त ने रिश्वत लेते पकड़ा उसे मामले की जांच पूरी होने और उसका निर्णय आने से पहले ही पदोन्नति दे दी, जबकि ऐसी कोई उपलब्धि भी नहीं है। कुल मिलाकर भ्रष्टाचारियों को पदोन्नति ही करना है तो विभागीय सीआर और गुप्त रिपोर्ट जैसी औपचारिकता क्यों ?


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