अब समय आ गया है कि ‘एक तंत्र’ और ‘लोकतंत्र’ के बीच देश को फैसला लेना होगा
इंदौर। संविधान दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह तथा वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए। अम्बेडकर प्रतिमा पर आयोजित इस कार्यक्रम में पत्रकारों से चर्चा करते हुए दोनों नेताओं ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और SIR प्रक्रिया को लेकर कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए।

मप्र के पूर्व सीएम कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि देश का लोकतंत्र अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव आयोग की साख बचाने के नाम पर 272 रिटायर्ड जज, आईएएस और आईपीएस अधिकारियों से हस्ताक्षर करवाए, जिनमें कई भाजपा व आरएसएस से जुड़े हुए हैं और जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों के घरों से करोड़ों रुपये मिले हैं, वही चुनाव आयोग का बचाव कर रहे हैं, जबकि आयोग “पूरी तरह बेईमानी पर उतर आया” है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं से छेड़छाड़ नहीं करे पीएम
सिंह ने प्रधानमंत्री को नसीहत देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं से छेड़छाड़ जैसी गतिविधियों से उन्हें स्वयं को अलग रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि “लोकतंत्र और संविधान बचाने का समय आ गया है। आज देशभर में कांग्रेस द्वारा संविधान बचाओ अभियान चलाया जा रहा है, और इसका सबसे बड़ा दायित्व युवाओं पर है, जिन्हें देश के भविष्य की रक्षा के लिए आगे आना होगा।
65 लाख से अधिक नागरिक मताधिकार से वंचित
दिग्विजय सिंह ने चेतावनी देते हुए कहा कि भाजपा सरकार SIR प्रक्रिया के माध्यम से मतदाताओं के अधिकार छीन रही है। उन्होंने दावा किया कि बिहार चुनाव के दौरान 65 लाख से अधिक भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित किया गया और चुनाव आयोग ‘मोदी सरकार की कठपुतली’ की तरह कार्य करता दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि “यदि नागरिकता छीन ली गई और मनचाही वोटर लिस्ट तैयार कर दी गई, तो यह देश लोकतंत्र नहीं, केवल एक तंत्र के हवाले हो जाएगा।”
लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन – तन्खा
राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने SIR प्रक्रिया को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि मतदाता सूची से मनमाने ढंग से नाम हटाना देश के लोकतांत्रिक अधिकारों का सीधा हनन है। उन्होंने कहा कि SIR प्रक्रिया में लगे BLA को लगातार दबाव, अव्यवस्था और अपारदर्शिता का सामना करना पड़ रहा है।


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