बिहार चुनाव में ओवैसी की पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर भले ही कांग्रेस की ना हो, लेकिन इसकी वजह देशव्यापी है. सिर्फ बिहार ही नहीं देशभर में कई ऐसे दल हैं, जिनसे इतिहास में कांग्रेस ने गठजोड़ किया है, लेकिन अब उनकी अर्जी पर विचार करने को भी तैयार नहीं है. दरअसल, महागठबंधन में शामिल होने के लिए ओवैसी राजद-कांग्रेस से अर्जी लगा चुके है लेकिन कांग्रेस सिर्फ बिहार के नजरिये से ओवैसी को नहीं देख रही है बल्कि देशभर के समीकरण के हिसाब से भी कांग्रेस ओवैसी से फिलहाल दूरी बनाकर चल रही है.
कट्टर मुस्लिम दलों से कांग्रेस क्यों बना रही है दूरी?
सिर्फ ओवैसी ही नहीं बल्कि असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी, बंगाल में फुरफुरा शरीफ की पार्टी और यूपी में तौकीर रजा की पार्टी समेत कट्टर मुस्लिम दलों से दूरी रखने की रणनीति पर है, जबकि इतिहास में इनसे कांग्रेस का गठबंधन रहा है. अलग-अलग राज्यों में कांग्रेस के जो गठबंधन के कई साथी हैं, उन्हें इन दलों को साथ लेने से ज्यादा परहेज नहीं है. लेकिन सूत्रों की मानें तो कांग्रेस फिलहाल ऐसे दलों से परहेज कर रही है, जिनके साथ जाने पर बीजेपी को देशभर में कांग्रेस की छवि को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का मौका मिल सके.
पिछले चुनाव में ओवैसी ने पहुंचाया था नुकसान
सूत्रों के मुताबिक, इस बीच कांग्रेस ने पिछले चुनाव से सबक लेते हुए आरजेडी को इस बात की छूट भी दी है कि अगर उसको लगता है कि सीमांचल जैसे इलाकों में जहां ओवैसी ने सबसे ज्यादा नुकसान महागठबंधन को पिछले चुनाव में पंहुचाया था, वहां पर अंदरखाने आपसी सहमति से उम्मीदवार दे दे, लेकिन किसी तरह का औपचारिक गठबंधन ना करें. दरअसल, कांग्रेस बीजेपी की हालिया हिंदू-मुस्लिम सियासत के मद्देनजर देशभर में अपनी छवि बचाए रखने के लिए ये कदम उठा रही है.


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