1947 की आजादी से लेकर आज तक हमारी सबसे भरोसेमंद आवाज
आज 13 फरवरी को पूरी दुनिया में विश्व रेडियो दिवस मनाया जा रहा है। स्मार्टफोन और इंटरनेट के इस दौर में भी रेडियो की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। जानिए इस साल की दिलचस्प थीम और भारत में रेडियो का सुनहरा इतिहास।
डेस्क रिपोर्ट (जनहित मीडिया): आज 13 फरवरी है, यानी ‘विश्व रेडियो दिवस’ (World Radio Day)। संचार के इस सबसे पुराने और भरोसेमंद माध्यम का जश्न मनाने के लिए यह दिन पूरी दुनिया में मनाया जाता है। आज जब हम हर छोटी-बड़ी जानकारी के लिए स्क्रीन की तरफ देखते हैं, तब भी रेडियो बिना किसी रुकावट के हमारे सफर का, घर के आंगन का और खेतों में काम करते किसानों का साथी बना हुआ है।
इस साल की थीम बेहद खास है, यूनेस्को (UNESCO) ने विश्व रेडियो दिवस 2026 के लिए एक बेहद समसामयिक थीम चुनी है— “रेडियो और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: एआई एक उपकरण है, आवाज नहीं” (Radio and Artificial Intelligence: AI is a tool, not a voice)। यह थीम यह संदेश देती है कि एआई (AI) तकनीक स्क्रिप्ट लिखने, ऑडियो सुधारने या आर्काइविंग में मदद जरूर कर सकती है, लेकिन एक रेडियो जॉकी या न्यूज़ एंकर की मानवीय भावना और सच्चाई की जगह कोई मशीन नहीं ले सकती। तकनीक एक टूल है, लेकिन रेडियो की असली ताकत उसकी मानवीय आवाज और विश्वसनीयता है।
इतिहास के पन्नों से: 1947 की वो रात और रेडियो: यूनेस्को ने 2011 में इस दिन को मनाने की घोषणा की थी, क्योंकि 13 फरवरी 1946 को ‘संयुक्त राष्ट्र रेडियो’ की शुरुआत हुई थी। लेकिन अगर भारत की बात करें, तो रेडियो का इतिहास बेहद जज्बाती रहा है। 14-15 अगस्त 1947 की वो मध्यरात्रि कोई कैसे भूल सकता है? जब रेडियो सेट की गूंज ने पूरे देश को आजादी का पहला संदेश सुनाया था। 1947 से लेकर 1950 में संविधान लागू होने तक, देश के हर बड़े फैसले, रियासतों के विलय और नए भारत की नींव रखे जाने की खबर आम जनता तक पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम रेडियो ही था।
रेडियो सिर्फ राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय खबरों तक सीमित नहीं है। इंदौर जैसे तेजी से बढ़ते शहरों में, जहां एक तरफ विकास और ट्रैफिक की हलचल रहती है, वहीं स्थानीय नागरिक मुद्दों की चर्चा भी जरूरी होती है। रेडियो आज भी सीधे जनता से जुड़ता है। चाहे राजवाड़ा का ट्रैफिक अपडेट हो, शहर के सफाई अभियान की जानकारी हो, या मालवा के किसानों के लिए मौसम का हाल, रेडियो की पहुंच आज भी ग्राउंड जीरो पर सबसे मजबूत है। यह एक ऐसा माध्यम है जो बिना किसी सब्सक्रिप्शन फीस के हर वर्ग को एक साथ जोड़ता है। भारत में पहला कम्युनिटी रेडियो स्टेशन 1 फरवरी 2004 को शुरू हुआ था, जिसने स्थानीय समुदायों को अपनी आवाज उठाने का मंच दिया। उत्तर प्रदेश के अमरोहा के राम सिंह बौद्ध को पिछले साल (2025) गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने दुनिया के सबसे बड़े रेडियो संग्रह (1,257 रेडियो सेट) के लिए सम्मानित किया था।
रेडियो सिर्फ एक डिवाइस नहीं, बल्कि एक एहसास है। एआई और डिजिटल स्ट्रीमिंग के इस नए दौर में रेडियो खुद को पॉडकास्ट और इंटरनेट रेडियो के जरिए अपडेट कर रहा है, लेकिन उसने अपनी वह पुरानी विश्वसनीयता और ‘ह्यूमन टच’ आज भी कायम रखा है। जनहित मीडिया की ओर से आप सभी को विश्व रेडियो दिवस की शुभकामनाएं!


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