भोपाल — मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने शनिवार को भोपाल में एक प्रेस वार्ता आयोजित कर, प्रदेश में जहरीली कफ सिरप ‘कोल्ड्रिफ’ के सेवन से 26 मासूम बच्चों की मौत के मामले में केंद्र और राज्य सरकारों पर तीखा हमला बोला है। दिग्विजय सिंह ने इस घटना को ‘हादसा नहीं, हत्या’ करार दिया और तत्काल सीबीआई (CBI) जांच तथा दोषी अधिकारियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह त्रासदी केवल दवा में गड़बड़ी नहीं है, बल्कि नकली दवाओं के संगठित कारोबार और सरकारी मिलीभगत का परिणाम है।
486 गुना ज्यादा ज़हर: ‘हादसा नहीं, हत्या’
दिग्विजय सिंह ने तकनीकी साक्ष्यों का हवाला देते हुए घटना की गंभीरता को उजागर किया। उन्होंने बताया:
- ज़हर की मात्रा: कफ सिरप में प्रतिबंधित औद्योगिक विलायक डाय-एथिलीन ग्लाइकोल (DEG) की मात्रा 48.6 प्रतिशत पाई गई।
- स्वीकृत सीमा: जबकि दवा में इसकी स्वीकृत सीमा केवल 0.1 प्रतिशत है।
- निष्कर्ष: इसका मतलब है कि सिरप में स्वीकृत सीमा से 486 गुना ज्यादा जहर मौजूद था।
सिंह ने कहा, “यह मानव जीवन के साथ खुला खिलवाड़ है। यह हादसा नहीं, यह स्पष्ट रूप से हत्या है।”
कठोर मांगें: CBI जांच और ₹50 लाख मुआवजा
पूर्व मुख्यमंत्री ने इस पूरे प्रकरण की जाँच और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए निम्नलिखित माँगें रखीं:
- CBI जांच: पूरे प्रकरण की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से समयबद्ध जाँच कराई जाए।
- हत्या का मुकदमा: दोषी अधिकारियों, दवा निर्माताओं और नियामकों पर हत्या सदृश अपराध (भारतीय न्याय संहिता की धारा 102) के तहत मुकदमा दर्ज किया जाए।
- मुआवजा: सभी पीड़ित परिवारों को तत्काल ₹50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।
उन्होंने इसे सिर्फ छिंदवाड़ा के 26 बच्चों की नहीं, बल्कि “पूरे देश के भविष्य की लड़ाई” बताया।
केंद्र और भाजपा पर गंभीर राजनीतिक आरोप
दिग्विजय सिंह ने केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर आपराधिक लापरवाही से भी बड़ा आरोप लगाया।
- इलेक्टोरल बॉन्ड कनेक्शन: उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने फार्मा कंपनियों से ₹945 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड प्राप्त किए, जिसके बदले में केंद्र सरकार ने जन विश्वास अधिनियम, 2023 में बदलाव किया।
- कानून में बदलाव: इस बदलाव के तहत, नकली दवाएं बनाने और बेचने के गंभीर अपराधों के लिए जेल की सजा हटा दी गई और केवल जुर्माने का प्रावधान रखा गया।
- “चंदा दो, धंधा लो”: सिंह ने आरोप लगाया कि यह “कंपनियों ने चंदा दो, धंधा लो” का खेल था, जिसने सरकार को कानून बदलकर अपराधियों को छूट देने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से जवाब मांगा और सवाल किया कि जब गाम्बिया (2022) और उज्बेकिस्तान (2023) में भारतीय दवाओं से बच्चों की मौत हो चुकी थी, तब भी केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने कोई सबक क्यों नहीं लिया।
मुख्यमंत्री और राज्य स्वास्थ्य समिति पर सवाल
राज्य के स्तर पर, सिंह ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और राज्य स्वास्थ्य समिति (जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं) की जवाबदेही तय करने की मांग की।
- उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य स्वास्थ्य समिति जन-स्वास्थ्य की जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रही।
- सिंह ने सवाल किया कि जहरीली दवा प्राइवेट डॉक्टरों के पर्चों पर खुले बाजार में बेची जा रही थी, लेकिन राज्य सरकार ने इसकी रोकथाम क्यों नहीं की।
लापरवाही जानबूझकर की गई: साक्ष्य का दावा
दिग्विजय सिंह ने दावा किया कि विभिन्न सरकारी रिपोर्टें यह साबित करती हैं कि यह लापरवाही जानबूझकर की गई:
- 42 दिन की देरी: जहरीली दवा को बाज़ार से वापस (रिकॉल) लेने में 42 दिन की भारी देरी क्यों हुई?
- निरीक्षण में कमी: CDSCO ने केवल 9% दवा फैक्ट्रियों का निरीक्षण किया, फिर भी केंद्र सरकार क्यों चुप रही?
- सबूत: उन्होंने तमिलनाडु ड्रग्स कंट्रोल डिपार्टमेंट की 3 अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट, CDSCO का सर्कुलर, नागपुर मेडिकल कॉलेज की ऑटोप्सी रिपोर्ट्स, और CAG ऑडिट का हवाला देते हुए कहा कि जहरीले सिरप का व्यापार कमीशनखोरी के संरक्षण में फलता-फूलता रहा।
यह गंभीर आरोप-प्रत्यारोप इस बात को रेखांकित करते हैं कि यह त्रासदी अब केवल एक स्वास्थ्य मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और नियामक मुद्दा बन चुकी है, जिस पर केंद्र और राज्य सरकार को तुरंत विस्तृत जवाब देना होगा।


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