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पितृ तर्पण क्या होता है और यह कब करना चाहिए? एक क्लिक में जानें सबकुछ!

Mangal Singh Rajput by Mangal Singh Rajput
September 15, 2025
in धर्म/समाज
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पितृ के शुरू होते ही अक्सर चारों तरफ से श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का नाम सुनने को मिलता है. पितृ पक्ष 15 दिनों तक चलते हैं और यह अवधि पूरी तरह से पूर्वजों को समर्पित होती है. इस दौरान लोग अपने पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान आदि करते हैं, ताकि पितरों की आत्मा तृप्त हो सकते और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहे. अक्सर लोग श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण को एक समझ लेते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. ये तीनों एक दूसरे से अलग होते हैं. इस लेख में हम आपको बताएंगे कि तर्पण क्या होता है, इसे क्यों करते हैं, तर्पण कैसे किया जाता है और तर्पण से जुड़ी कुछ जरूरी बातें.

तर्पण का अर्थ

तर्पण का मतलब है तृप्त करना या संतुष्ट करना. यह एक धार्मिक क्रिया है जिसमें पितरों, देवताओं और ऋषियों को जल, तिल, दूध और अन्य सामग्री अर्पित की जाती है, जिससे उनकी आत्मा को शांति और संतोष मिले. यह क्रिया विशेष रूप से पितृ पक्ष के दौरान की जाती है.

पितृ तर्पण क्या है?

पितृ तर्पण में जल, दूध, तिल और कुश से अपने मृत पूर्वजों को जल अर्पित कर उनकी आत्मा की शांति और आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है. तर्पण पितृ पक्ष में या पितरों के ज्ञात निधन की तिथि पर किया जाता है, जिससे वे तृप्त होते हैं और परिवार को संतान, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करें.

पितृ तर्पण क्यों करते हैं?

पूर्वजों को शांति:- पितृ लोक में निवास करने वाले पूर्वजों को जल की जरूरत होती है, जो उन्हें तर्पण के माध्यम से दिया जाता है. इससे वे तृप्त होते हैं और उनकी आत्मा को शांति मिलती है.

आशीर्वाद की प्राप्ति:- तर्पण से प्रसन्न होकर पूर्वज अपने परिवार को संतान सुख, उत्तम सेहत, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.

पितृ ऋण से मुक्ति:- धार्मिक मान्यताओं में पितृ तर्पण को पितृ ऋण से मुक्ति पाने का एक तरीका भी माना जाता है.

पितृ तर्पण में क्या-क्या सामग्री चाहिए?

पितृ तर्पण के लिए आपको तांबे का लोटा, गंगाजल, काले तिल, जौ, सफेद फूल, गाय का कच्चा दूध, कुशा, घी, और सफेद सूती कपड़े की जरूरत होती है.

पितृ का तर्पण कैसे किया जाता है?

  • पितृ तर्पण विधि में सबसे पहले स्नान कर साफ कपड़े पहनें.
  • फिर हाथ में कुश की अंगूठी पहनकर या कुशा को तर्जनी और अंगूठे के बीच रखकर जल, काले तिल, अक्षत और सफेद फूल से भरी अंजलि बनाएं.
  • दक्षिण दिशा में मुख करके दाहिने पैर को मोड़कर बैठ जाएं.
  • फिर पितृ तीर्थ यानी अंगूठे और तर्जनी अंगुली के बीच के हिस्से से धीरे-धीरे जल गिराएं.
  • जल गिराते हुए अपने पितरों का नाम लें और “ॐ पितृभ्यः नमः” मंत्र का जाप करें.
  • पितरों को जल चढ़ाते समय पितरों का ध्यान करें और अंत में भोजन दान करें या किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं.

पितृ तर्पण कितने बजे करना चाहिए?

पितृ तर्पण कुतुप काल में करना चाहिए, जो कि दोपहर लगभग 11:30 बजे से 12:30 या 12:45 बजे तक होता है. इस समय आकाश में सूर्य सबसे ऊंचे स्थान पर होता है और इस दौरान किया गया तर्पण सीधा पितरों तक पहुंचता है.

तर्पण के लिए किस दिशा में बैठना चाहिए?

पितृ तर्पण करने के लिए हमेशा पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए. इस बात का ध्यान रखें कि ब्रह्म मुहूर्त में कभी तर्पण नहीं करना चाहिए.

तर्पण करते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?

तर्पण करते समय आप ‘ॐ सर्वपितृभ्यः स्वधा नमः’ मंत्र का जाप कर सकते हैं, जो कि सभी पितरों के लिए बोला जाता है.

क्या लड़कियां पितृ तर्पण कर सकती हैं?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, महिलाएं, बेटियां, पत्नियां, बहुएं भी विधिपूर्वक पितृ तर्पण कर सकती हैं और श्राद्ध में भी भाग ले सकती हैं.

पितृ तर्पण कौन कर सकता है?

मृत पिता के पुत्र को अपने पिता की मृत्यु के एक साल बाद पितृ तर्पण करना शुरू करना चाहिए और हर साल करते रहना चाहिए.

पितरों का तर्पण कहां करना चाहिए?

पितरों का तर्पण पवित्र स्थानों जैसे नदी तट (विशेष रूप से संगम), तीर्थस्थल या बरगद के पेड़ के नीचे किया जा सकता है. अगर इन जगहों पर संभव न हो तो आप अपने घर पर भी तर्पण कर सकते हैं.

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रात 2 बजे भंवरकुआ पहुंचे जीतू पटवारी
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