एआरओ को बचाने के लिए जांच के नाम पर की लीपापोती
जिसकी आईडी से खाते खुले उसकी जांच भी नहीं की, 2 रसूख वालो के लिए छोटे कर्मचारियों की बलि
इंदौर ( जनहित मीडिया )। नोटरी से नामांतरण घोटाले के मामले में जांच दल ने जांच पूरी कर ली है। सरकारी भाषा में जांच रिपोर्ट पेश कर दी गई है पर वास्तविक स्थिति में यह जांच रिपोर्ट नहीं है, बल्कि सहायक राजस्व अधिकारी और अधिकारी को बचाने के लिए छोटे कर्मचारियों की बलि लेने के दस्तावेज तैयार किए गए हैं।

नगर निगम में घोटाले कोई नई बात नहीं है। घोटालों की कमी भी नहीं है, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ जब कोई घोटाला उजागर हुआ तो कुछ महीने में ही उसकी जांच पूरी करने की बात कही जा रही है। दरअसल राजस्व विभाग नगर निगम में नोटरी से नामांतरण करने के घोटाले में अपर आयुक्त ने जो जांच की है। उस जांच में छोटे कर्मचारियों की बलि चढ़ाकर असली गुनहगारों को बचाने का काम किया है। घोटाले का मुख्य सरगना मयूर पाटिल साफ़ बच गया है और मुख्यालय पर बैठा हुआ है जबकि छोटे कर्मचारी और बेगुनाह भी नप गए।
ज्ञात हो कि जिस आईडी से खाता खोले गए वह तात्कालिक सहायक आयुक्त के.एस. सागर की आईडी से मयूर द्वारा खोले गए थे। बावजूद इसके मयूर पाटिल का कही नाम नहीं है।
रजिस्ट्री से नामांतरण की जांच
इस पूरे मामले में झोन क्रमांक 11 के वार्ड क्रमांक 60 में दौलतगंज जहां की संपत्तियों की रजिस्ट्री होती है। वहां के प्रकरण में झोन 10 के बिल कलेक्टर रियाज अंसारी को उलझा दिया है। जबकि संबंधित आवेदक ने झोन पर नामांतरण के लिए आवेदन किया था और खाता कैसे खोला गया इसकी कोई जानकारी नहीं दी। जांच करने वालों ने खुद ही स्क्रिप्ट लिख दी। इसी तरह दो अन्य कर्मी ऐसे हैं जिनकी हैसियत चपरासी की भी नहीं है। वे साहब (पाटिल) के इशारे पर की बोर्ड और माउस घुमाते थे।
एआरओ को बचाने का खेल
कितने का घोटाला हुआ और कैसी की जांच हुई यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है! एआरओ मयूर पाटिल को बचाना ज्यादा जरूरी है, क्योंकि सहायक राजस्व अधिकारी के फंसने से बात उपायुक्त तक पहुंच सकती थी। कुल मिलाकर अधिकारी और मयूर पाटिल नहीं फंसे इस तरह का षड्यंत्र रचा गया है।
यह है पूरा मामला
नगर निगम के राजस्व विभाग में नोटरी के मकान अथवा प्लॉट का बिना किसी अधिकृत अथॉरिटी के नामांतरण का मामला सामने आने के बाद प्रारंभिक जांच में आया कि 350 से अधिक प्रकरणों में नोटरी वाली संपत्तियों के मालिक बदल गए हैं। यह भी बताया जाता है कि प्रत्येक खाते पर 50 हजार से 2 लाख रुपए तक लिए गए और सारे प्रकरणों में लगभग 4 करोड़ की काली कमाई की गई। खास बात 4यह है कि यह काम दो उपायुक्तों की आईडी से हुआ था। इसी मामले में राजस्व उपायुक्त, सहायक राजस्व अधिकारी को बचाकर नीचे वालों की नौकरी खाकर मामला रफादफा किया गया है। बच्च स्तरीय जांच होना चाहिए।


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