प्रयागराज: प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच हुआ टकराव अब एक बड़े धर्म युद्ध का रूप लेता जा रहा है। प्रशासन द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर अविमुक्तेश्वरानंद की ‘शंकराचार्य’ पदवी पर सवाल उठाने और संतों के साथ कथित अभद्रता के बाद देश के बड़े धर्माचार्य और कथावाचक उनके समर्थन में आ गए हैं।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक संत ने सीएम योगी को खून से पत्र लिखा है, तो वहीं गोवर्धनमठ के शंकराचार्य ने अविमुक्तेश्वरानंद को अपना ‘लाडला’ बताया है।
शंकराचार्य निश्चलानंद: ‘वो मेरा लाडला है’
गोवर्धनमठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने इस विवाद पर अपनी बेबाक राय रखते हुए आपसी प्रेम का संदेश दिया। उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अपना ‘लाडला’ बताते हुए साधु-संतों के बीच किसी भी तरह के टकराव को गलत बताया। उन्होंने प्रशासन की कार्रवाई पर नाराजगी जताते हुए कहा, “साधु-संतों के साथ मारपीट और ब्रह्मचारियों की चोटियां पकड़कर खींचना बिल्कुल गलत है। स्नान की मर्यादा का ध्यान सभी को रखना चाहिए।”
सीएम योगी को खून से पत्र: ‘साधुओं का अपमान हुआ’
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर केस के मुख्य याचिकाकर्ता दिनेश फलाहारी महाराज ने विरोध का अनोखा और उग्र तरीका अपनाया। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने खून से पत्र लिखा है। “शंकराचार्य हिंदुओं के भगवान हैं, जिनके पैर पीएम मोदी भी छूते हैं। माघ मेले के वीडियो से स्पष्ट है कि अधिकारियों ने संतों का अपमान किया है। सनातनी संतों के इस युद्ध का फायदा दूसरे दल उठा रहे हैं। “प्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने पंचकुइयां स्थित जीआईसी मैदान में विराट हिंदू सम्मेलन के दौरान इसे ‘धर्म संकट’ करार दिया। उन्होंने कहा, “जिसके माथे पर तिलक, सिर पर शिखा और शरीर पर भगवा हो, प्रशासन को उनकी बात सुननी चाहिए। मारपीट करना ठीक नहीं है।” उन्होंने कहा कि आपसी मतभेद भुलाकर मामले को सुलझाना चाहिए, इसे और तूल देना सनातन के लिए ठीक नहीं है।
योगगुरु बाबा रामदेव ने भी विवाद पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि तीर्थ स्थलों पर विवाद करने से सनातन का अपयश होता है। हमें आपस में लड़ने के बजाय सनातन की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए।
आखिर विवाद की जड़ क्या है?
माघ मेले में स्नान को लेकर हुए विवाद के बाद प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का हवाला देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी किया था। नोटिस में पूछा गया था कि उन्होंने खुद को ‘शंकराचार्य’ कैसे घोषित कर लिया, जबकि मामला अदालत में विचाराधीन है। इसी नोटिस और पुलिसिया कार्रवाई के बाद संत समाज आक्रोशित है।


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