8- 10 वर्षों में ध्वस्त हो गई जल वितरण व्यवस्था, नगर निगम की बेवकूफी ने 40 साल का नर्मदा का पानी का अटूट भरोसा तोड़ा
जिन घरों में नलों में नर्मदा का पानी आता है वे भी पीने के लिए उपयोग करते हैं बोरिंग का पानी
दूषित पानी की शिकायतें लगातार बढ़ रही है, अरबों रुपए फूकने के बाद भी नहीं सुधर सके व्यवस्था
निलंबन या तबादला अरबों कमाने वालो के लिए सजा है या जिम्मेदारी से वरी हो गए ?
इंदौर ( जनहित मीडिया )। पिछले 48 सालों से इंदौर में नर्मदा का पानी आता है। इसमें 40 साल तक लोगों का बोरिंग या अन्य स्रोत की अपेक्षा यहां तक की आरओ के पानी से भी ज्यादा विश्वास नर्मदा के पानी पर था। यहां तक कि स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल, रेस्टोरेंट और होटल “नर्मदा का उत्तम पेयजल” लिखा बोर्ड लगाते थे। लेकिन अब यह विश्वास टूटने लगा है और लोग पीने के लिए बोरिंग का पानी उपयोग करने लगे हैं। क्या 40 साल का हमारा विश्वास तोड़ने वालों का तबादला करने या पद से हटा देने की सजा पर्याप्त है ?


काली कमाई का गढ़ बन चुके इंदौर के भ्रष्ट नेता और भ्रष्ट अफसरों की सांठगांठ ने शहर में ब्रांडिंग की ऐसी दौड़ लगाई है कि लोगों को हर दूसरे दिन एक नए हथकंडे से गुमराह करते हैं और इसकी आड़ में मूलभूत सुविधाओ से वंचित करते जा रहे हैं। पिछले दिनों सराफा में पुराने ट्रेडिशनल और नए फास्ट फूड नई और पुरानी दुकानों के नाम पर ही जिन दर्जन भर नेताओं ने सराफा मोर्चा संभाल लिया था, आवश्यकता पड़ने पर वे जनता को नजर नहीं आते हैं। कभी सफाई में नंबर वन, कभी वेटलैंड सिटी, कभी वाटर हार्वेस्टिंग में अवार्ड तो कभी नवाचार के नाम पर ब्रांडिंग वाले नेताओं ने इंदौर में सड़क, ड्रेनेज और पानी जैसी नगर निगम द्वारा दी जाने वाली मूलभूत सुविधाओं से शहर को वंचित कर दिया है। पिछले 10 वर्षों में हजारों करोड़ों रुपए फूकने के बाद भी शहर की सडके जर्जर है, ड्रेनेज लाइन खराब है, सफाई व्यवस्था भी ध्वस्त है और पीने के पानी के बारे में तो चर्चा भी बेमानी है। जिस नर्मदा से इंदौर पानी लाने के लिए पुराने नेताओं और अधिकारियों ने खूब मशक्कत की अब वही नर्मदा का पानी इंदौर में वितरण के दौरान जहरीला होता जा रहा है।
पिछले 8-10 वर्षों में अरबों रुपए खर्च के बावजूद जल वितरण की व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। अब आए दिन इंदौर में दूषित गंध मरता हुआ पानी नलों में आ रहा है। निचली बस्तियों में तो हालत यह है कि पहले 10-15 मिनट नलों में मल आता है, उसके बाद गंदा पानी आता है और सबसे आखरी में कुछ देर के लिए अच्छा पानी मिल पाता है वह भी पीने योग्य है या नहीं इसकी क्या गारंटी है ?
कई बस्तियों में आता है मल-मूत्र
शहर में कई ऐसी बस्तियां है जिनमें नलों में 3 स्टेप में पानी आता है। सुबह घरों में नल खोलते ही पहले 10 से 15 मिनट तक बहुत ही ज्यादा गंदा और गंध मारता हुआ ( मल युक्त ) पानी आता है। उसके बाद मठमैला और उसके बार साफ पानी आता है और यह पानी वितरण के गंदा होता है।
नमूने विश्वसनीय नहीं
शहर में वितरित किए जाने वाले नर्मदा के पानी की पीएचई की लैब में जांच की जाती है। जांच में पानी पीने योग्य हो सकता है, लेकिन यह रिपोर्ट विश्वसनीय नहीं है। *जनहित मीडिया* ने इसको लेकर पहले भी खुलासा किया है कि नगर निगम द्वारा पानी की जांच के लिए टंकी के पास से नमूने लिए जाते हैं जबकि यह नमूने लोगों के घरों में आने वाले नल से लिया जाना चाहिए। नर्मदा से आने वाला पानी जल उत्पादन फिल्टर का ट्रीटमेंट किया जाता है और उसे टंकी तक पहुंचाया जाता है इसमें किसी तरह की मिलावट और अशुद्ध की संभावना बहुत कम होती है जबकि टंकी से वितरण के दौरान घर के नल तक पानी आने में ड्रेनेज का पानी मिल रहा है और इसी से नर्मदा का पानी दूषित हो रहा है।
महंगे खर्च पर आता है 540 MLD पानी, वितरण आधा ही
इंदौर में 1977 तक पानी के लिए यशवंत सागर और बिलावली तालाब के अलावा कुछ अन्य छोटे तालाब और कुएं-बावड़िया थे। समय के साथ जल स्रोत सूखने लगे यशवंत सागर और बिलावली का पानी कम पड़ने लगा, तब 1977 में नर्मदा का पहला चरण पूरा हुआ। उसके बाद 1992 में नर्मदा का दूसरा चरण और उसके बाद तीसरा चरण मिलकर 540 एम पानी नर्मदा नदी से इंदौर लाया जाता है। नर्मदा नदी से 500 मीटर का घाट चढ़कर पानी इंदौ पानी इंदौर लाते हैं। 540 एमएलडी लगभग 200 एमएलडी घरों तक नहीं पहुंच पाता और वितरण होने तक 540 में से कुल 350 एमएलडी से भी कम लोगों तक पहुंच पाता है।


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