नई दिल्ली/भोपाल। लोकतंत्र में प्रेस कॉन्फ्रेंस (PC) संवाद का सबसे महत्वपूर्ण सेतु होती है, जहां सत्ता पक्ष या विपक्ष जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह परंपरा तेज़ी से खत्म होती दिखाई दे रही है, और यह चिंताजनक है कि पत्रकारिता का यह अहम स्तंभ अब ‘बाइट एंड रन’ (बयान दो और निकल जाओ) की संस्कृति में सिमटता जा रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश द्वारा रविवार (12 अक्टूबर) को नई दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस इसका ताज़ा उदाहरण है। अपनी 45 मिनट की स्पीच में उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार पर सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम को कमजोर करने का आरोप लगाया। उन्होंने गंभीर दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एमए की डिग्री को सार्वजनिक होने से बचाने के लिए RTI और डेटा प्रोटेक्शन एक्ट में संशोधन किए गए।
‘ओन्ली आरटीआई’ की तानाशाही
जब जयराम रमेश ने अपना विस्तृत बयान खत्म किया, तो उन्होंने पत्रकारों पर यह कहकर प्रश्न थोपना चाहा कि वे “सिर्फ आरटीआई के बारे में ही प्रश्न करेंगे।” जब एक पत्रकार ने कांग्रेस के ही नेता पी. चिदंबरम के ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार गलती थी’ वाले बयान पर सवाल पूछा, तो रमेश झल्लाकर बार-बार “ओन्ली आरटीआई… ओन्ली आरटीआई” दोहराने लगे। सवाल उठता है कि जब एक राष्ट्रीय प्रवक्ता अपनी बात पूरी विस्तार से कह चुका है, तो वह पत्रकारों पर क्यों थोपना चाहता है कि सवाल किस विषय पर किए जाएं? पत्रकार का काम सिर्फ राजनीतिक दलों के तय एजेंडे पर सहमति जताना नहीं, बल्कि जनता से जुड़े हर ज्वलंत मुद्दे पर सवाल करना है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों का एक ही ट्रेंड
आलोचना अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर होती रही है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में एक भी अधिकृत प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं ली है। यह सत्य है। लेकिन दुखद यह है कि विपक्ष और राज्यों के बड़े नेता भी अब उसी राह पर चल पड़े हैं, जहां ‘सूचना देना’ उद्देश्य है, लेकिन ‘जवाबदेही’ नदारद है। उदाहरण के लिए:
- कुछ समय पहले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ‘वोट चोर’ विषय पर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, लेकिन पत्रकार सवाल ही नहीं पूछ पाए।
- मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में ग्वालियर में कृषि विश्वविद्यालय में अधिकृत प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। उन्होंने प्रदेश में इन्वेस्टमेंट आने का दावा करते हुए एक लंबा बयान पढ़ा और पत्रकारों के सवाल पूछने से पहले ही उठकर चल दिए।
- सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के मध्य प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने भी अभी तक एक भी अधिकृत प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं ली है।
स्थानीय नेताओं की ‘सुविधाजनक पत्रकारिता’
यह समस्या केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं है। ग्वालियर के भाजपा नेता देवेंद्र प्रताप सिंह तोमर रामू ने जब इस्कॉन की जगन्नाथ यात्रा पर PC बुलाई और उनकी बात पूरी हुई, तो एक पत्रकार ने उनके वायरल हुए वीडियो के बारे में सवाल पूछ लिया। रामू नाराज हो गए और कहने लगे, “आज के दिन आपको यह विषय पूछना ही नहीं चाहिए। इस पर कभी और विस्तार से जवाब दूंगा।”
हकीकत यही है कि ‘और कभी’ बड़े नेता न तो मिलते हैं, न फोन उठाते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेता द्वारा दी गई जानकारी को ध्यान से सुनने के बाद पत्रकार यदि उनसे जुड़े व्यक्तिगत या सार्वजनिक प्रश्नों को पूछ रहा है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।


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