देवी भागवत और पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है कि कन्याओं के साथ लंगूर को पूजन में शामिल करने से पूजा पूर्ण और फलदायी मानी जाती है. यही कारण है कि अष्टमी और नवमी के दिन जब घर-घर कन्या पूजन होता है, तो एक लंगूर का विशेष महत्व होता है. यह परंपरा सिर्फ धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि लोक-आस्था और परंपरा की गहराई से जुड़ी हुई है.
भैरव बाबा का रक्षक रूप
कन्या पूजन में लंगूर का मुख्य महत्व भैरव बाबा से जुड़ा है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, भैरव बाबा दुर्गा माता के रक्षक हैं. पूजन में लंगूर का होना इस बात का प्रतीक है कि पूजा सुरक्षित और शुभ तरीके से संपन्न हो, और नकारात्मक शक्तियाँ किसी प्रकार की बाधा न डालें.
गणेश जी और शुभता का प्रतीक
कुछ क्षेत्रों में लंगूर को भगवान गणेश का रूप भी माना जाता है. गणेश जी विघ्नहर्ता और शुभता के देवता हैं इसलिए, कन्या पूजन में लंगूर को आमंत्रित करने से सभी कार्यों में सफलता और घर-परिवार में समृद्धि आती है.
लोक परंपरा और विश्वास
लंगूर को भोजन कराना या पूजन में शामिल करना लोक मान्यताओं का हिस्सा है. माना जाता है कि इससे देवी दुर्गा और भैरव बाबा की कृपा प्राप्त होती है, घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है और कन्याओं के जीवन में सुरक्षा, बुद्धि और सौभाग्य की वृद्धि होती है.
प्रतीकात्मक संदेश
लंगूर चतुर, फुर्तीला और सतर्क होता है. पूजन में उसका समावेश यह संदेश देता है कि कन्याएँ जीवन में सतर्क और बुद्धिमान बनें और परिवारिक सुरक्षा और समृद्धि बनी रहे.
कन्या पूजन में लंगूर का होना केवल रस्म नहीं, बल्कि यह सुरक्षा, शुभता और देवी-देवताओं की कृपा का प्रतीक है. यह परंपरा हमें यह याद दिलाती है कि धार्मिक रीति-रिवाजों के पीछे गहरा धार्मिक और सामाजिक संदेश होता है.


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