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जुलूस-ए-मोहम्मदी: इतिहास, संघर्ष और सौहार्द का प्रतीक, अंग्रेजों से संघर्ष के बाद पड़ी थी इसकी बुनियाद

Mangal Singh Rajput by Mangal Singh Rajput
September 5, 2025
in उत्तरप्रदेश
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कानपुर में पैगंबर-ए-इस्लाम के यौम-ए-पैदाइश यानी जन्मदिवस के अवसर पर निकाला जाने वाला जुलूस-ए-मोहम्मदी केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि सौहार्द, एकता और बलिदान की ऐतिहासिक परंपरा से भी जुड़ा है. आज यह जुलूस भाईचारे और प्रेम का संदेश लेकर निकलता है, लेकिन इसकी शुरुआत अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन और क्रांतिकारियों के बलिदान से हुई थी. अंग्रेजों से संघर्ष के बाद ही इस जुलूस की बुनियाद पड़ी, जो पिछले 112 सालों से बदस्तूर जारी है. ऐसा भी दावा किया जाता है कि यह जुलूस एशिया का सबसे बड़ा धार्मिक जुलूस है.

वर्ष 1913 की घटना कानपुर के इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है. उस समय यूनाइटेड प्रॉविंस के गवर्नर जे.एस. मेस्टन के आदेश पर कलेक्टर एच.जी.एस. टेलर और पुलिस अधीक्षक डाड ने सड़क चौड़ीकरण की योजना बनाई. योजना के तहत डफरिन अस्पताल से लेकर तोपखाना बाजार होते हुए मूलगंज तक सड़क विस्तार का कार्य शुरू हुआ. इस प्रक्रिया में मूलगंज की मछली बाजार मस्जिद का हिस्सा और पास ही स्थित राम-जानकी मंदिर का चबूतरा क्षतिग्रस्त कर दिया गया.

मस्जिद और मंदिर दोनों पर हुए इस आघात ने हिंदू और मुस्लिम समुदाय को एक साथ आक्रोशित कर दिया. विरोध स्वरूप ईदगाह में एक बड़ी सभा आयोजित की गई. अंग्रेजों ने सभा को दबाने के लिए घोड़े दौड़ाए और गोलियां चलाईं. इस गोलीकांड में 70 से अधिक लोग शहीद हो गए और सैकड़ों गिरफ्तार किए गए. इस बलिदान ने दोनों समुदायों को और अधिक नजदीक ला दिया. यहीं से परेड ग्राउंड तक जुलूस निकालने की परंपरा शुरू हुई, जो आगे चलकर जुलूस-ए-मोहम्मदी के रूप में पहचानी जाने लगी. यह गोलीकांड एक तरह से जलियांवाला बाग कांड की तरह ही था.

परंपरा की शुरुआत और विकास

उस समय यह जुलूस पैगंबर-ए-इस्लाम के जन्मदिवस के अवसर पर निकाला गया था. अरबी महीने रबी-उल-अव्वल की 12 तारीख को जुलूस निकालने की परंपरा तब से लगातार जारी है. इस जुलूस ने न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी एक गहरी छाप छोड़ी. 1948 से जमीयत उलमा इस जुलूस का नेतृत्व करता आ रहा है. वर्तमान समय में यह जुलूस लगभग 14.5 किलोमीटर लंबा हो चुका है और इसमें लगभग पांच लाख अकीदतमंद शामिल होते हैं.

जुलूस का उद्देश्य और संदेश

आज यह जुलूस केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि सामाजिक सौहार्द और भाईचारे का प्रतीक है. इसमें सभी वर्गों और समुदायों के लोग किसी न किसी रूप में भाग लेते हैं. जुलूस के माध्यम से विभिन्न संदेश भी दिए जाते हैं. जैसे एकता और आपसी समन्वय, प्रेम और भाईचारा का संदेश, समाज में शांति और सौहार्द की स्थापना, अनुशासन और दिशा-निर्देश का पालन. हर साल जुलूस को सफलतापूर्वक और शांति से संपन्न कराने के लिए जमीयत उलमा की ओर से दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं. इस बार भी विशेष अपील की गई है कि अकीदतमंद नियमों का पालन करते हुए जुलूस में शामिल हों.

जारी दिशा-निर्देशों के प्रमुख बिंदु

इतने लंबे जुलूस जिसमें लाखों अकीदतमंद शिरकत करते हैं, उसको सफलतापूर्वक बनाने के लिए विभिन्न दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं. इसमें प्रमुख है… 10 फीट से अधिक ऊंचे झंडे लेकर न चलें, लोहे के रॉड वाले झंडों की जगह बांस या लकड़ी के झंडे प्रयोग करें, लोडर या वाहनों पर बैठने के बजाय पैदल चलें. इन तीनों निर्देशों का संबंध बिजली के तारों की वजह से है, जिससे कोई अप्रिय घटना न होने पाए. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार दो से अधिक लाउडस्पीकर का प्रयोग न करें और ध्वनि मानकों का पालन करें. धार्मिक जुलूस में किसी भी प्रकार के राजनीतिक नारे, झंडे या बैनर का इस्तेमाल न हो. स्वच्छ कपड़े पहनें, इत्र लगाएं और सिर पर टोपी रखें. जिन मार्गों पर गणेश महोत्सव या अन्य आयोजन चल रहे हों, वहां शांति और समन्वय बनाए रखें.

सौहार्द का संदेश

जमीयत उलमा के पदाधिकारियों का कहना है कि यह जुलूस केवल आस्था का नहीं, बल्कि इतिहास और बलिदान का प्रतीक है. वर्ष 1913 में जो आंदोलन शुरू हुआ था, उसने हिंदू-मुस्लिम एकजुटता की मिसाल पेश की थी. उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आज भी यह जुलूस सामाजिक समरसता और भाईचारे का पैगाम देता है. प्रदेश उपाध्यक्ष मौलाना अमीनुल हक अब्दुल्लाह कासमी के अनुसार, जुलूस-ए-मोहम्मदी का उद्देश्य केवल धार्मिक उत्सव मनाना नहीं है, बल्कि यह दिखाना है कि जब समाज के सभी वर्ग मिलकर चलते हैं तो किसी भी चुनौती का सामना किया जा सकता है.

जुलूस-ए-मोहम्मदी का इतिहास केवल धार्मिक उत्सव का नहीं, बल्कि संघर्ष, बलिदान और एकता का इतिहास है. 1913 के आंदोलन से लेकर आज तक इस जुलूस ने हर बार सौहार्द और भाईचारे का संदेश दिया है. पांच लाख से अधिक अकीदतमंदों की भागीदारी इस परंपरा की गहराई और मजबूती का प्रमाण है. आज जब समाज में विभाजन की कोशिशें बढ़ रही हैं, ऐसे आयोजनों की अहमियत और भी बढ़ जाती है. जुलूस-ए-मोहम्मदी हमें यह याद दिलाता है कि सच्ची ताकत एकता और प्रेम में है, न कि भेदभाव में.

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