ईरान इजरायल युद्ध। शनिवार को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के शीर्ष नेतृत्व और सैन्य ठिकानों पर किए गए भीषण हमलों के बाद मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में युद्ध की लपटें तेज हो गई हैं। तेहरान सहित कई शहरों में हुए हवाई हमलों में अपने शीर्ष नेताओं को खोने के बाद ईरान ने बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई शुरू की है। ईरान ने न केवल इजरायल पर मिसाइलें दागी हैं, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, कतर और कुवैत जैसे उन खाड़ी देशों को भी निशाना बनाया है जहाँ अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की यह रणनीति बेहद सोच-समझकर तैयार की गई है। लंदन के किंग्स कॉलेज में डिफेंस स्टडीज के लेक्चरर रॉब गीस्ट पिनफोल्ड के अनुसार, ईरान इन खाड़ी देशों को ‘सॉफ्ट टारगेट’ के रूप में देख रहा है। इजरायल की अभेद्य सुरक्षा प्रणाली (जैसे आयरन डोम) की तुलना में इन देशों पर हमला करना तकनीकी रूप से आसान है। इसके पीछे ईरान का मुख्य उद्देश्य इन संपन्न देशों पर दबाव बनाना है ताकि वे अपने आर्थिक नुकसान और जमीन पर होती उथल-पुथल से बचने के लिए ट्रंप प्रशासन पर युद्धविराम (सीजफायर) के लिए दबाव डालें।
खाड़ी देशों के लिए यह स्थिति ‘कुआं और खाई’ जैसी बन गई है। एक तरफ जहाँ वे सार्वजनिक बयानों में अपनी एकता और संप्रभुता की रक्षा का दावा कर रहे हैं, वहीं अंदरूनी तौर पर इस बात को लेकर गहरी असहमति है कि ईरान के साथ सीधे संघर्ष में उतरना चाहिए या कूटनीतिक रास्ता अपनाना चाहिए। ये देश लंबे समय से अमेरिका के सहयोगी रहे हैं और इनकी जमीन पर मौजूद अमेरिकी सैन्य सुविधाएं अब ईरान के लिए प्राथमिक लक्ष्य बन गई हैं।
रॉब पिनफोल्ड का तर्क है कि ईरान अच्छी तरह जानता है कि उसने इन अमीर खाड़ी देशों को एक बड़ी दुविधा में डाल दिया है। यदि ये देश अमेरिका और इजरायल के साथ युद्ध में सीधे शामिल होते हैं, तो उनका पर्यटन और तेल आधारित बुनियादी ढांचा पूरी तरह तबाह हो सकता है। फिलहाल, दुनिया की नजरें इन देशों के अगले कदम पर टिकी हैं, क्योंकि उनके पास अपनी संप्रभुता बचाने के विकल्प लगातार कम होते जा रहे हैं।


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