बड़वानी। मध्य प्रदेश की राजनीति में सोमवार को एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ा, जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बड़वानी जिले के नागलवाड़ी स्थित भीलट देव मंदिर परिसर में प्रदेश की पहली ‘किसान कैबिनेट’ की बैठक आयोजित की। टेंट-तंबू के बीच हुई इस अनूठी बैठक और मंत्रिमंडल द्वारा आदिवासी संस्कृति के लोक पर्व ‘भगोरिया’ में सहभागिता को आगामी 2027 के नगरीय निकाय और 2028 के विधानसभा चुनावों की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘कृषक कल्याण वर्ष 2026’ के तहत राजधानी भोपाल से 350 किलोमीटर दूर जनजातीय अंचल में कैबिनेट ले जाना, भाजपा के आदिवासी वोट बैंक को अभेद्य बनाने की रणनीति का हिस्सा है।
मध्य प्रदेश की सत्ता की चाबी मानी जाने वाली 47 अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षित सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच हमेशा से कांटे की टक्कर रही है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2013 में भाजपा ने इन 47 में से 31 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था, लेकिन 2018 में समीकरण बदले और भाजपा महज 16 सीटों पर सिमट गई, जबकि कांग्रेस ने 30 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की थी। 2023 के पिछले चुनाव में भाजपा ने फिर सुधार किया और 24 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस 22 सीटों पर रही। मालवा-निमाड़ अंचल, जो आदिवासी राजनीति का केंद्र है, वहां भी 22 आरक्षित सीटों में से भाजपा और कांग्रेस के बीच लगभग बराबरी का मुकाबला (भाजपा 10, कांग्रेस 11) रहा है। ऐसे में मोहन सरकार का यह कदम इस ‘डेडलॉक’ को तोड़ने की कोशिश माना जा रहा है।
सरकार के लिए अगले दो साल ‘अग्निपरीक्षा’ के समान हैं। भाजपा के संकल्प पत्र के वादों को पूरा करना सरकार की बड़ी चुनौती है, जिसमें ‘लाडली बहना योजना’ की राशि को 3000 रुपये तक ले जाना सबसे प्रमुख है। वर्तमान में दी जा रही राशि को अगले तीन वर्षों में दोगुना करना सत्ता में वापसी की राह आसान कर सकता है। नागलवाड़ी की इस बैठक के माध्यम से सरकार ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि उसकी प्राथमिकताएं अब सीधे तौर पर खेत और खलिहान से जुड़ी हैं।
दूसरी ओर, विपक्ष ने इस आयोजन को केवल ‘इवेंट’ करार दिया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि दो दशक से सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा अब ‘कृषि कैबिनेट’ का ढोंग कर रही है। सिंघार ने सवाल उठाया कि किसानों की आय दोगुनी करने का दावा करने वाली सरकार बताए कि बड़वानी और निमाड़ के किसानों को इस बैठक से धरातल पर क्या हासिल हुआ? विपक्ष का आरोप है कि सरकार केवल चुनावी गणित साधने के लिए प्रतीकात्मक बैठकें कर रही है, जबकि जमीनी स्तर पर किसान और आदिवासी अब भी अपनी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे हैं।

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