₹50 लाख में बने थे हाईटेक स्टॉप; निगम को ठेकेदार से मिलेंगे ₹2.5 करोड़
इंदौर — इंदौर शहर के बीआरटीएस (BRTS) कॉरिडोर को हटाने में हो रही अत्यधिक देरी पर हाईकोर्ट की कड़ी नाराजगी के बाद, आखिरकार नगर निगम ने बस स्टॉप तोड़ने का काम शुरू कर दिया है। इंदौर का साढ़े 11 किलोमीटर लंबा बीआरटीएस, जो 9 महीने बाद भी लगभग एक किलोमीटर भी नहीं हट पाया है, अब व्हाइट चर्च की तरफ के हिस्से के बस स्टॉप को तोड़ने की प्रक्रिया में है।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
बीआरटीएस को हटाने में हो रही देरी पर हाईकोर्ट ने नगर निगम और जिला प्रशासन के अधिकारियों पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है।
कोर्ट की टिप्पणी: “भोपाल का बीआरटीएस 9 दिन में हट गया था, लेकिन इंदौर का बीआरटीएस 9 महीने बाद भी नहीं हट पाया।”
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि “किसी का मकान तोड़ना हो तो अफसर मिनटों में मशीन लेकर मौके पर चल देते हैं, लेकिन बीआरटीएस तोड़ने में इतनी देरी क्यों हो रही है।” कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर तय की है और कलेक्टर व निगमायुक्त को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने के लिए कहा है।
महंगे बस स्टॉप पर पानी की तरह बहा पैसा
जब बीआरटीएस कॉरिडोर का निर्माण हुआ था, तब नगर निगम ने बस स्टॉपों के निर्माण पर भारी भरकम राशि खर्च की थी, जिसे अब तोड़ा जा रहा है:
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निर्माण लागत: एक बस स्टॉप को तैयार करने में ₹50 लाख रुपये से ज्यादा की राशि लगी थी। पूरे कॉरिडोर पर पंद्रह से अधिक ऐसे महंगे बस स्टॉप बनाए गए थे।
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विशेषताएं: इन बस स्टॉप पर स्वचलित दरवाजे लगाए गए थे, जो महंगे सेंसर से बस आते ही खुल जाते थे। इसके अलावा, इनमें कांच की दीवारें थीं, और स्टॉप की सीलिंग भी विदेश से मंगाई गई लकड़ी से तैयार की गई थी।
ठेकेदारी और राजस्व का समीकरण
बीआरटीएस को हटाने का काम ठेकेदार एजेंसी को सौंपा गया है, लेकिन ठेकेदार भी बेमन से काम कर रहे हैं क्योंकि उन्हें ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है:
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ठेके की शर्त: ठेकेदार को बीआरटीएस की रैलिंग और बस स्टॉप तोड़ने के बाद निकलने वाली सामग्री के उपयोग का अधिकार रहेगा।
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निगम को आय: इसके एवज में ठेकेदार एजेंसी को नगर निगम को ₹2.5 करोड़ रुपये देना होंगे।
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कार्य की गति: ठेकेदार एजेंसी को दिन में बस स्टॉप तोड़ने और रात को बीआरटीएस की रैलिंग हटाने के लिए कहा गया है।
लगभग ₹50 लाख में बने बस स्टॉप को तोड़ने का काम शुरू होना और इस पर हाईकोर्ट की नाराजगी, इंदौर में सार्वजनिक परियोजनाओं के क्रियान्वयन में हुई अक्षमता और लेटलतीफी को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।


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