कानपुर में पैगंबर-ए-इस्लाम के यौम-ए-पैदाइश यानी जन्मदिवस के अवसर पर निकाला जाने वाला जुलूस-ए-मोहम्मदी केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि सौहार्द, एकता और बलिदान की ऐतिहासिक परंपरा से भी जुड़ा है. आज यह जुलूस भाईचारे और प्रेम का संदेश लेकर निकलता है, लेकिन इसकी शुरुआत अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन और क्रांतिकारियों के बलिदान से हुई थी. अंग्रेजों से संघर्ष के बाद ही इस जुलूस की बुनियाद पड़ी, जो पिछले 112 सालों से बदस्तूर जारी है. ऐसा भी दावा किया जाता है कि यह जुलूस एशिया का सबसे बड़ा धार्मिक जुलूस है.
वर्ष 1913 की घटना कानपुर के इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है. उस समय यूनाइटेड प्रॉविंस के गवर्नर जे.एस. मेस्टन के आदेश पर कलेक्टर एच.जी.एस. टेलर और पुलिस अधीक्षक डाड ने सड़क चौड़ीकरण की योजना बनाई. योजना के तहत डफरिन अस्पताल से लेकर तोपखाना बाजार होते हुए मूलगंज तक सड़क विस्तार का कार्य शुरू हुआ. इस प्रक्रिया में मूलगंज की मछली बाजार मस्जिद का हिस्सा और पास ही स्थित राम-जानकी मंदिर का चबूतरा क्षतिग्रस्त कर दिया गया.


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