शहीद दिवस: भारत की आजादी के इतिहास में 23 मार्च का दिन स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। आज पूरा देश उन वीर सपूतों, स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों को नमन कर रहा है, जिन्होंने मातृभूमि की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे दी। शहीद दिवस विशेष रूप से अमर शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान को समर्पित है, जिनकी शहादत ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं और सोए हुए भारत में क्रांति की एक नई अलख जगाई थी।
शहीद दिवस का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर से जुड़ा है जब ब्रिटिश शासन के अत्याचार अपने चरम पर थे। वर्ष 1928 में लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज और उनकी मृत्यु का बदला लेने के लिए भगत सिंह और उनके साथियों ने अंग्रेज पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी थी। इस घटना ने क्रांतिकारी आंदोलन को एक नई दिशा दी। इसके बाद, 1929 में केंद्रीय असेंबली में बम फेंककर और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारों से गूंज पैदा कर भगत सिंह ने स्पष्ट कर दिया था कि वे बहरी अंग्रेज सरकार को सुनाना चाहते हैं।
अदालत की कार्यवाही के दौरान भी इन क्रांतिकारियों का साहस कम नहीं हुआ। उनके वैचारिक दृढ़ता और देशप्रेम के बयानों ने पूरे देश के युवाओं को उद्वेलित कर दिया था। अंततः 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में इन तीनों नायकों को फांसी दे दी गई। फांसी के फंदे को चूमते समय उनके चेहरों पर जो मुस्कान और निर्भीकता थी, उसने साबित कर दिया कि व्यक्तिगत साहस और पूर्ण समर्पण ही आजादी की राह प्रशस्त करता है।
यह दिन केवल इन तीन महानायकों की याद तक सीमित नहीं है, बल्कि उन अनगिनत अनाम वीरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है जिन्होंने गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। शहीद दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और आजादी की कीमत से अवगत कराना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र की सेवा और उसके प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन करना ही सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। आज देशभर के शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों पर इन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है।


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