क्या अधिकारी संरक्षण के बिना संभव है पत्रकार पर हमला ?
सरकारी व्यवस्था के साझेदार क्यों अपराधी मानसिकता के लोग ?
बाबुओं के एवजियो को बाहर करें
इंदौर। आरटीओ में भ्रष्टाचार को उजागर करने पर पत्रकार पर हमला करने वाले गुंडई और आतंकी सोच के पीछे लंबे समय तक कुर्सी पर जमे अफसर है। जब एक ही कुर्सी पर दो दशक का साम्राज्य होगा तो सरकारी दफ्तर को बपौती ही समझा जाएगा और संविधान के चौथे स्तंभ पर ये हमला उसी बपौती का परिणाम है। फिर परिवहन कार्यालय में अधिकारी और बाबुओं के पैर पड़ने वाली जो परंपरा है यह भी गुंडई संरक्षण का केंद्र है।
किसी भी सरकारी दफ्तर में नमस्ते और जय हिंद तो सुना होगा लेकिन आरटीओ में पैर पड़ने धोक देने की परंपरा देखी जा सकती है। परिवहन विभाग का काम करने वाले एजेंट, ऐवजी और उनके संरक्षक बदमाश भी बाबूओ और अफसरो के पैर पडते दिखाई देंगे और यही परंपरा गुंडागर्दी करने वालों को कार्यालय के भीतर से संरक्षण देती है। इसके अलावा लंबे समय से एक ही कुर्सी पर जमे बाबुओं और अफसरों ने परिवहन कार्यालय को बपौती बना लिया है। मठाधीशों की तरह जमे हुए यह शासकीय सेवक भ्रष्टाचार को खूब संरक्षण देते हैं और विभाग की ऐसी कोई शाखा नहीं जिसमें भ्रष्टाचार नहीं होता हो। IND 24 के पत्रकार हेमंत शर्मा को भी भ्रष्टाचार में पूर्णतया डूबे हुए परिवहन विभाग के घोटाले उजागर करने का खामियाजा भुगतना पड़ा और सरकार तथा जनता के हित में काम करने वाले पत्रकार की जान पर बन आई।
नोट गिन रहा था चिंतामन का ऐवजी
परिवहन विभाग की लाइसेंस शाखा में पदस्थ बाबू अंकित चिंतामण की कार्यशैली किसी से छिपी हुई नहीं है। कल भी कार्यालय में चिंतामण का ऐवजी नोट गिन रहा था। इस दौरान शर्मा के कैमरामैन ने वीडियो बना लिया जिसको लेकर कहा सुनी हुई। वीडियो मिटाने के लिए दबाव बनाया जिससे इंकार करने के बाद देखते ही देखते विवाद बढ़ गया और चिंतामण उसके ऐवजी सहित कुछ अन्य लोगों ने मीडियाकर्मियों के साथ बुरी तरह मारपीट कर डाली। हालांकि इस 3मामले में अभिकर्ताओं (एजेंट) को जबरिया घसीटा जा रहा है। जबकि पूरे प्रकरण में किसी भी एजेंट का कोई लेना-देना नहीं है। विवाद हमेशा एवजियो को लेकर ही होते हैं।
ये भ्रष्टाचार के गढ़
आरटीओ कार्यालय में दो पहिया व चार पहिया लाइसेंस के अलावा वाहनों के फिटनेस, परमिट, पंजीयन, बैंक नीलामी की एनओसी, पुराने वाहनों के परमिट, बसों में सवारी क्षमता, भारवाहक वाहनों की क्षमता बढ़ाने जेसे काम में आरटीओ के बाबू और ऐवजी मोटा पैसा वसूलते है। इतना ही नहीं बस ऑपरेटर और ट्रांसपोर्टरों से अधिकारियों और बाबुओं के ऐवजी हर महीने बंदी भी वसूलते हैं। बताया जाता है कि यह राशि करोड़ रुपए के आसपास है


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