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केपी शर्मा ओली की चार बड़ी गलतियां जिनकी वजह से ‘खूनी क्रांति’ का शिकार हो गया नेपाल

Mangal Singh Rajput by Mangal Singh Rajput
September 9, 2025
in देश-विदेश
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भारत के एक और पड़ोसी मुल्क में भी आग लग गई है. नेपाल में पिछले दिनों सोशल मीडिया पर बैन लगाए जाने का इस कदर विरोध हो गया कि वहां पर लोग सड़क पर उतर आए और सरकार की विदाई हो गई. देश में सरकार विरोधी जबर्दस्त प्रदर्शन को देखते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने आज मंगलवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. पिछले हफ्ते तक शांत दिख रहे एक फैसले की वजह से नेपाली युवाओं ने विद्रोह कर दिया और वहां खूनी संघर्ष शुरू हो गया. पीएम ओली को इस्तीफा देना पड़ गया. आखिर वो कौन सी गलतियां रहीं जिसकी वजह से ओली को पद छोड़ना पड़ गया.

जेन जी के बैनर तले प्रदर्शनकारियों ने राजधानी काठमांडु के कई हिस्सों में प्रधानमंत्री ओली के खिलाफ लगातार जमकर नारे लगाए. कई जगहों पर आगजनी भी की गई. नेपाल के विदेश मंत्री की उनके परिवार के साथ पिटाई कर दी गई. नाराजगी इस कदर रही कि कई नेताओं और मंत्रियों के घरों में तोड़फोड़ और आगजनी की गई. भारी हिंसा के बीच गृह मंत्री रमेश लेखक ने कल ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. पीएम को इस्तीफा देने के लिए मजबूर करने वाली जेन ज़ी वे युवा हैं जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ.

पार्टी और सरकार को डिक्टेटर की तरह चलाया

प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली नेपाल की राजनीति के बड़े खिलाड़ी माने जाते रहे हैं. वह चौथी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे. नेपाल में बेरोजगारी चरम पर है और इधर देश में भ्रष्टाचार भी लगातार बढ़ता जा रहा था. ओली इसे रोक पाने में नाकाम साबित हुए. ओली मिली-जुली सरकार चला रहे थे. उनकी सरकार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) नेपाली कांग्रेस पार्टी के समर्थन से चल रही थी.

लेकिन वह मिली-जुली सरकार चलाने के बाद भी पार्टी और सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाए हुए थे. कहा जाता है कि सरकार से जुड़े बड़े फैसले के लिए भी वह अपने सहयोगियों से ज्यादा सलाह मशविरा नहीं किया करते थे. ओली को चीन परस्त नेता माना जाता है और वो भारत से ज्यादा चीन के करीबी माने जाते हैं. उनकी कोशिश यही थी कि जिस तरह से चीन ने अपने यहां बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बैन लगा रखा है, वो भी अपने देश में यही करना चाहते थे. सोशल मीडिया पर अंकुश के जरिए लोगों की आवाज भी दबाने की कोशिश में लगे थे, लेकिन सोशल मीडिया पर बैन लगाने का उनका तानाशाही और तुगलकीभर फैसला उनके खिलाफ चला गया.

ओली ने ⁠पड़ोसी देशों से खराब किए संबंध

नेपाल लैंडलॉक्ड देश है और भारत तथा चीन इसके अहम पड़ोसी देश हैं. वह भारत विरोधी रहे हैं. पिछले महीने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी जब नेपाल के दौरे पर थे तब उन्होंने ओली को दिल्ली आने का न्योता दिया था. कहा जा रहा है कि पहले वह उन्होंने आने का प्लान बनाया था, लेकिन बाद में रद्द कर दिया गया.

चौथी बार प्रधानमंत्री के रूप में ओली का कार्यकाल विवादों में रहा. भारत के साथ उनका रिश्ता कटुता भरा रहा. भारत पीएम ओली के अनावश्यक राष्ट्रवादी रवैये से नाराज था. उन्होंने लिपुलेख सीमा से जुड़े मसले पर भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने की कोशिश की थी.

पिछले हफ्ते चीन के तियानजिन शहर में आयोजित की गई शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में भी पीएम ओली भी शामिल हुए थे. पहले उनकी योजना प्रधानमंत्री मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक करने की थी, लेकिन बाद में यह बैठक रद्द कर दी गई. ओली सरकार चीन के साथ मधुर रिश्ते बनाने के चक्कर में भारत से अपने संबंध लगातार बिगाड़ती चली गई. बताया जाता है कि हालात यह हो गए कि भारत ओली सरकार से नाराज चल रहा था.

⁠अमेरिका से ले लिया सीधा पंगा

नेपाल में हिंसा और आगजनी, ओली सरकार के पतन के लिए खुद ओली सरकार ही जिम्मेदार रही. उसने अपने यहां जिन सोशल मीडिया पर बैन लगाया, वो सब की सब अमेरिका की कंपनी थीं. ये सभी बड़ी और रसूखदार कंपनियां थीं. ओली सरकार ने इस एकतरफा फैसले के जरिए अमेरिका से सीधे-सीधे पंगा ले लिया. सरकार ने सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनियों फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाट्सऐप, मैसेंजर, यूट्यूब, X (ट्वीटर) और स्नैपचैट पर बैन लगा दिया.

ये सभी कंपनियां अमेरिका से जुड़ी थीं, जबकि नेपाल में टिकटॉक,वी चैट, वीबो और लाइकी जैसे ऐप जारी रहे जो चीन की कंपनियां हैं.ऐसे में यह दुनियाभर में यह मैसेज गया कि ओली सरकार चीन का समर्थन कर रही है जबकि वह अमेरिका के खिलाफ है. फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाट्सऐप, मैसेंजर, यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारत और अन्य देशों की तरह नेपाल में भी खासा लोकप्रिय है. नेपाल सरकार के फैसले के खिलाफ युवा पीढ़ी उग्र हो गई.

⁠’जेन-जी’ से बात नहीं, गोली चलाने के आदेश

केपी शर्मा ओली भले ही चौथी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने हों, लेकिन वह यह भांपने में चूक गए कि युवा पीढ़ी के खिलाफ फैसला उन पर ही भारी पड़ जाएगा. पिछले हफ्ते जब पीएम ओली ने सोशल मीडिया पर बैन लगाने का फैसला लिया तो उन्होंने जेन-जेड यानी युवा पीढ़ी से कोई बात ही नहीं की.

फैसले के खिलाफ जब लोग सड़क पर उतरे. काठमांडु समेत पूरे नेपाल में प्रदर्शन तेज होता चला गया तो सरकार ने प्रदर्शनकारियों के ऊपर गोली चलाने के आदेश जारी कर दिया. फायरिंग की घटना में कल सोमवार को 19 लोगों की मौत हो गई जबकि 350 से अधिक घायल हो गए. वहां पर छात्रों के नेतृत्व में हो रहे विरोध प्रदर्शन में आम लोगों का भी गुस्सा दिख रहा है. प्रदर्शनकारी कर्फ्यू और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बावजूद राजधानी काठमांडु और अन्य स्थानों पर जमा हुए हैं. सरकार ने अब बैन भले ही हटा दिया है, लेकिन विद्रोह की चिंगारी सुलगी हुई है. देखना है कि यह आग कितनी जल्दी बुझती है.

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